सोयाबीन दूसरा स्प्रे फसल की अच्छी बढ़वार और अधिक उत्पादन के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। कृषि विशेषज्ञों के अनुसार, पहले स्प्रे के बाद लगभग 30 से 35 दिन की अवस्था में फसल की नियमित निगरानी करना जरूरी होता है। इसी समय सफेद मक्खी, तना मक्खी, गर्डल बीटल, हरी इल्ली, सेमी लूपर, एफिड और कई फफूंदजनित रोगों का खतरा बढ़ने लगता है। यदि समय पर उचित प्रबंधन किया जाए, तो फसल को नुकसान से बचाया जा सकता है।
सोयाबीन दूसरा स्प्रे: कब और क्यों है जरूरी?
पहला स्प्रे सामान्यतः फसल की 15 से 20 दिन की अवस्था में किया जाता है। इसके बाद लगभग 30 से 35 दिन की फसल पर दूसरा स्प्रे करने की सलाह दी जाती है। इस समय पौधों में तेजी से बढ़वार होती है और फूल बनने की तैयारी शुरू हो जाती है। यदि इस चरण में कीट और रोगों का नियंत्रण नहीं किया जाए, तो उपज पर सीधा असर पड़ सकता है।
किन कीटों और रोगों का बढ़ता है खतरा?
इस अवस्था में सफेद मक्खी, तना मक्खी, गर्डल बीटल, हरी इल्ली, काली इल्ली और सेमी लूपर जैसे कीट अधिक सक्रिय हो जाते हैं। इसके अलावा लीफ स्पॉट, रस्ट तथा अन्य फफूंदजनित रोग भी दिखाई दे सकते हैं। इसलिए खेत का नियमित निरीक्षण करना और शुरुआती लक्षण दिखते ही उचित कार्रवाई करना आवश्यक है।
विशेषज्ञ क्या सलाह देते हैं?
कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि दूसरे स्प्रे के दौरान केवल कीटनाशक ही नहीं, बल्कि आवश्यकता के अनुसार फफूंदनाशक और संतुलित पोषक तत्वों का भी उपयोग किया जा सकता है। हालांकि किसी भी दवा का चयन खेत की वास्तविक स्थिति, कीटों की संख्या और रोग के स्तर को देखकर ही करना चाहिए।
पंजीकृत और प्रमाणित उत्पादों का उपयोग करें तथा हमेशा उत्पाद के लेबल पर दिए गए निर्देशों और स्थानीय कृषि विशेषज्ञ की सलाह का पालन करें।
मौसम और स्प्रे का सही समय
छिड़काव के लिए मौसम साफ होना चाहिए। यदि स्प्रे के तुरंत बाद बारिश हो जाए, तो दवा का प्रभाव कम हो सकता है। इसलिए ऐसे समय का चयन करें जब कम से कम दो घंटे तक वर्षा की संभावना न हो।
छिड़काव के लिए पर्याप्त मात्रा में साफ पानी का उपयोग करें और पूरे खेत में समान रूप से स्प्रे करें ताकि दवा हर पौधे तक समान रूप से पहुंच सके।
पोषण प्रबंधन भी है जरूरी
यदि फसल स्वस्थ और गहरे हरे रंग की दिखाई दे रही है, तो अतिरिक्त ग्रोथ प्रमोटर या पोषक तत्वों की आवश्यकता हर स्थिति में नहीं होती। वहीं यदि पौधों में पीलापन, कमजोर बढ़वार या पोषक तत्वों की कमी दिखाई दे, तो कृषि विशेषज्ञ की सलाह के अनुसार संतुलित पोषण प्रबंधन अपनाया जा सकता है।
लागत कम, उत्पादन अधिक कैसे?
विशेषज्ञों का मानना है कि अनावश्यक दवाओं के उपयोग से बचना चाहिए। केवल आवश्यकता होने पर ही कीटनाशक, फफूंदनाशक या पोषक तत्वों का प्रयोग करें। खेत की नियमित निगरानी और समेकित कीट प्रबंधन (IPM) अपनाने से लागत कम रखने और बेहतर उत्पादन प्राप्त करने में मदद मिल सकती है।
निष्कर्ष
सोयाबीन की फसल में दूसरा स्प्रे सही समय पर करना अत्यंत महत्वपूर्ण है। खेत की स्थिति, कीटों की संख्या, रोग के लक्षण और मौसम को ध्यान में रखते हुए उचित दवा का चयन करें। कृषि विशेषज्ञ की सलाह और अनुशंसित मात्रा का पालन करने से फसल स्वस्थ रहती है, उत्पादन बेहतर होता है और अनावश्यक खर्च से भी बचा जा सकता है।